Friday, September 22, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-32 देवी नहीं है,कहीं कोई देवी नहीं है। विसर्जनःदेवता के नाम मनुष्यता खोता मनुष्य দেবতার নামে মনুষ্যত্ব হারায় মানুষ पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-32

देवी नहीं है,कहीं कोई देवी नहीं है।

विसर्जनःदेवता के नाम मनुष्यता खोता मनुष्य

দেবতার নামে

মনুষ্যত্ব হারায় মানুষ

पलाश विश्वास

वैसे भी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी के मध्य मनुस्मृति विरोधी रवींद्र के दलित विमर्श को जारी रखने में भारी कठिनाई हो रही।रवींद्र के दलित विमर्श और उससे संदर्भ सामग्री शेयर करने पर बार बार रोक लग रही है।

दैवी सत्ता और राजसत्ता के देवी पक्ष में देवी के अस्तित्व से इंकार के नाटक विसर्जन की चर्चा इस अंध धर्मोन्माद के महिषासुर वध उत्सव के मध्य बेहद मुश्किल है लेकिन जरुरी भी है सत्ता ने वर्ग वर्ण नस्ली तिलिस्म को तोड़ने के लिए।

रवींद्र नाथ ने राष्ट्रवाद के विरुद्ध त्रिपुरा राजपरिवार को लेकर राजर्षि उपन्यास लिखा,जिसका प्रकाशन 1889 में हुआ।फिर उन्होंने इसी उपन्यास के पहले अंश को लेकर विसर्जन नाटक लिखा,जो 1890 में प्रकाशित हुआ।

राष्ट्रवाद के नाम अंध धर्मोन्माद के खिलाफ यह नाटक है जिसमें बलि प्रथा का विरोध है और देवी के अस्तित्व से सिरे से इंकार है।जयसिंह के आत्म बलिदान की कथा भी यह है.जो सत्य,अहिंसा और प्रेम की मनुष्यता का उत्कर्ष है।

धर्म और आस्था से बड़ी है मनुष्यता और वही विश्वमानव जयसिंह है।

रवींद्रनाथ ने सीधे कह दिया हैःदेवी नहीं है,कही कोई देवी नहीं है।

सिर्फ विसर्जन नाटक ही नहीं,रवींद्रनाथ ने विसर्जन शीर्षक से गंगासागर तीर्त यात्रा के दौरान पुरोहित के उकसावे पर देवता के रोष से बचने के लिए तीर्थ यात्रियों के अंध विश्वास के कारण एक विधवा के इकलौते बेटे को गंगा में विसर्जन की कथा अपनी कविता देवतार ग्रास में लिखी है।

इस नाटक में दैवी सत्ता  राजसत्ता के साधन बतौर प्रस्तुत है। अंध धर्मोन्माद की सत्ता की राजनीति बेनकाब है इसमें,जो आज का सच है।

आम जनता में देव देवी के नाम धर्मसत्ता के आवाहन के तहत राष्ट्रव्यवस्था पर कब्जा करके निजी हित साधने के तंत्र मंत्र का पर्दाफाश करते हुए रवींद्र कहते हैं कि जिस दिवी के नाम यह धर्मोन्माद है,वह कहीं है ही नहीं।

यह सियासती मजहब इंसानियत के खिलाफ है।

मनुष्यता के खिलाफ पशुता को महोत्सव है यह धर्मोन्माद।

आज से करीब सवासौ साल पहले रवींद्र नाथ इस मजहबी सियासत के खिलाफ मुखर थे और हम आज उसी मजहबी सियासते के पक्षधर बनकर महिषासुर वध की तरह रवींद्रनाथ के वध के उत्सव में शामिल हैं और इस पर संवाद प्रतिबंधित है।

सवासौ साल पहले यूरोप के धर्मयुद्ध के राष्ट्रवाद के विरुद्ध भारतीय मनुष्यता के धरम की बात कर रहे थे रवींद्रनाथ और देव,देवी,ईश्वर के नाम अंध विश्वास की पूंजी के दम पर धर्म सत्ता के आवाहन से सत्ता के अपहरण के राष्ट्रवाद पर हिंसा,घृणा और नरसंहार की संस्कृति के विरुद्ध सत्य,प्रेम और अहिंसा के मनुष्यताबोध का आवाहन कर रहे थे रवींद्रनाथ।

इस नाटक की पृष्ठभूमि त्रिपुरा में गोमती नदी के पास विख्यात कालीमंदिर है तो कथा का स्रोत बौद्धसाहित्य है।हिंसा और घृणा की नरसंहारी वैदिकी संस्कृति के विरुद्ध महात्मा तथागत गौतम बुद्ध के सत्य,प्रेम और अहिंसा की वाणी है।

धर्म का अर्थ मनुष्यता का धारण है।

धर्म का अर्थ मनुष्य और प्रकृति का आध्यात्मिक तादात्म्य है।

भारतीय दर्शन परंपरा की साझा विरासत की जमीन पर खड़े रवींद्रनाथ ने इस नाटक के जरिये वैदिकी कर्मकांड, बलिप्रथा, रक्तपात, हिंसा के माध्यम से दैवी सत्ता के आवाहन के राजकीय आयोजन को धर्म या आस्था मानने से सिरे इंकार करते हुए कहा है,देवी नही है।

देवी कहीं नही है।

जो है वह मनुष्यता है।

जो है वह सत्य और सुंदर है।

जो है वह मनुष्य और मनुष्यता है।

मनुष्य और मनुष्य के बीच अहिंसा और प्रेम का मानवबंधन है।

घृणा और हिंसा के धर्मस्थल की पाषाणप्रतिमा में देवी नहीं है।

देवी कहीं नहीं है।

महात्मा गौतम बुद्ध के धम्म के अनुसार जीवों से प्रेम और स्वामी विवेकानंद के नरनारायण का अद्भुत समन्वय है इस नाटक का कथानक और कथ्य दोनों।

अंध विश्वास की पूंजी परआधारित धार्मिक कट्टरपंथ के हिंसा और घृणा पर आधारित नरसंहारी राष्ट्रवाद के विरुद्ध मनुष्यता और सभ्यता का आधार सत्य,प्रेम और अहिसा है,जो सत्य है,सुंदर है और शाश्वत भी है।

भारतीय दर्शन परंपरा में यही धर्म है।

संत सूफी भक्ति आंदोलन,बाउल फकीर आंदोलन के विमर्श में मनुष्यता के धर्म भी वैदिकी संस्कृति के मनुस्मृति धर्म की हिंसा,घृणा,बलि और वध के खिलाफ है।

धर्म का समूचा भारतीय दर्शन नरसंहार संस्कृति के खिलाफ है जो आज पासिस्ट कारपोरेट नस्ली वर्चस्व का राष्ट्रवाद है।

परंपरा और लोकाचार नहीं,धर्म का आशय मनुष्य की मुक्ति और मानव कल्याण है और मनुष्यों की सामाजिक एकता है।जहां भेदभाव विषमता अन्या और असमानता के लिए कोई स्थान नहीं है,जो पश्चिम के फासिस्ट दैवीसत्ता के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के अनिवार्य तत्व हैं।

राजर्षि उपन्यास और विसर्जन नाटक का कुल सार यही है।

रवींद्रनाथ ने लिखा भी हैः 'ধর্ম যখন তার প্রকৃত উদ্দেশ্য ও স্বরূপ হারিয়ে নিমজ্জিত হয় গোড়ামি ও আচার সর্বস্বতায়, তখন তা হয়ে ওঠে মানবতাবিরোধী।'

अनुवादः धर्म जब अपने सही ल्क्ष्य से भटककर,अपना स्वरुप खोकर कट्टरपंथ और कर्मकांड सर्वस्वता में निष्णात हो जाता है,तब वह मनुष्यताविरोधी धर्म बन जाता है।

आज मनुष्यता विरोधी प्रकृति विरोधी धर्म और धर्मोन्मादी नरसंहारी राष्ट्रवाद के शिकंजे में मनुष्यता मर रही है और प्रकृति से मनुष्यता और सभ्यता का मानवबंधन टूट रहा है।गोरक्षा तांडव महिषासुर वध उत्सव की बलि बेदी पर मनुष्यता के वध का उत्सव है यह मुक्तबाजारी कारपोरेट धर्मोन्मादी महोत्सव का नंगा कार्निवाल।

नाटक की शुरुआत में त्रिपुरा की रानी गुणवती पुत्र की कामना लेकर धर्म गुरु रघुपति के समक्ष पशुबलि की मनौती करती हैं।लेकिन राजा गोविंदमाणिक्य ने त्रिपुरा में पशुबलि निषिद्ध कर दी है और वे जीवों से प्रेम के खिलाफ हिंसा को धर्म के विरुद्ध मानते हैं।लेकिनरानी की पुत्रकामना को पूंजी बनाकर पशुबलि संपन्न करने के लक्ष्य में अडिग थे राजपुरोहित धर्मगुरु।

हम आज ऐसे धर्मगुरुओं,राजपरुोहितों,राजकीय संतों साध्वियों का तांडव और कटकटेला अंधकार का उनका कारोबारी राजकाज देख रहे हैं।

मनुष्यता के धर्म के महानायक रुप में राजा गोविंदमाणिक्य का चरित्र है।

दैवीसत्ता के राजसत्ता पर वर्चस्व के लिए त्रिपुरा राजपरिवार में गृहयुद्ध का पर्यावरण इस नाटक का कथानक है जो आज के गोरक्षा तंडव का सच भी है।

पुरोहित दैवीसत्ता के पक्ष में राजसत्ता पर दैवीसत्ता के वर्चस्व के लिए राजमाता और त्रिपुरा के जणगण की आस्था और उनके अंध विश्वास के आधार पर धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण में कामयाब हो जाते हैं जो आज का सबसे बड़ा राजनीतिक सच है जिसके सामने प्रतिरोध सिरे से असंभव हो गया है और पशुबलि की जगह नरबलि का महोत्सव जारी है।

धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण में बहुसंख्य आम जनता की आस्था और अंध विश्वास के राजनीतिक इस्तेमाल के राष्ट्रवाद की सुनामी की वजह से नरबलि का महोत्सव धर्म कर्म और राजकाज साथ साथ हैं।

क्षत्रपों को सत्ता समीकरण में सत्ता साझा करने की सोशल इंजीनियरिंग की तरह राजपुरोहित धर्म और देवी की स्वप्न आज्ञा का हवाला देकर सेनापति को राजा के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाते है और राजा केभाई नक्षत्र राय को नया राजा बनाने काप्रलोभन देकर तख्ता पलट की साजिश रचते हैं।

भाई से भाई की हत्या कराने के लिए इस धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण की साजिशाना मजहबी सियासत के खिलाफ जयसिंह  प्रतिरोध करते हैं।

वे सीधे सवाल खड़ा करते हैं ः

'একী শুনিলাম ! দয়াময়ী মাতঃ;

...ভাই দিয়ে ভ্রাতৃহত্যা?

...হেন আজ্ঞা

মাতৃআজ্ঞা বলে করিলে প্রচার।'

अनुवादः

यह क्या सुन रहा हूं! दयामयी माता

---भाई के हाथों भाई की हत्या?

…. ऐसे आदेश को

माता का आदेश बताकर हो रहा है प्रचार।

तकनीकी क्रांति के माध्यमों और विधाओं पर वर्चस्व हो जाने से धर्मोन्मादी प्रचार तंत्र का यह बीज है जो अब विषवृक्षों का महारण्य है।सारे वनस्पति मरणासण्ण हैं।फिजां जहरीली है और हर सांस के साथ हिंसा और घृणा का संक्रमण है।

फिर इस साजिश का पता चलने पर राजा गोविंदमाणिक्य कहते हैंः

'...জানিয়াছি, দেবতার নামে

মনুষ্যত্ব হারায় মানুষ।'

अनुवादः

जान गया मैं,देवता के नाम

मनुष्यता खोता मनुष्य

नाटक के अंत में जयसिंह के आत्म बलिदान से राजपुरोहित का मन बदलता है।पुत्रसमान जयसिंह को खोने के बाद वैदिकी हिंसा में उनकी आस्था डगमगा जाती है।

जयसिंह को खोने के बाद भिखारिणी अपर्णा के समक्ष राजपुरोहित रघुपति सच का सामना करते हैंः

'পাষাণ ভাঙ্গিয়া গেল জননী আমার

এবার দিয়েছ দেখা প্রত্যক্ষ প্রতিমা

জননী অমৃতময়ী।'

पाषाण टूट गया है जननी मेरी

अब प्रत्यक्ष प्रतिमा का दर्शन मिला है

जननी अमृतमयी

नाटक के अंतिम दृश्य में हिंसा की धर्मोन्मादी आस्था की देवी मूर्ति टूट जाती है और धर्मोन्मादी राजपुरोहित खुद  देवी के अस्तित्व से ही इंकार कर देते हैं।

देखेंः

গুণবতী। জয় জয় মহাদেবী।

                দেবী কই?

রঘুপতি।                 দেবী নাই।

গুণবতী।                             ফিরাও দেবীরে

            গুরুদেব, এনে দাও তাঁরে, রোষ শান্তি

            করিব তাঁহার। আনিয়াছি মার পূজা।

            রাজ্য পতি সব ছেড়ে পালিয়াছি শুধু

            প্রতিজ্ঞা আমার। দয়া করো, দয়া করে

            দেবীরে ফিরায়ে আনো শুধু, আজি এই

            এক রাত্রি তরে। কোথা দেবী?

রঘুপতি। কোথাও সে

            নাই। ঊর্ধ্বে নাই, নিম্নে নাই, কোথাও সে

            নাই, কোথাও সে ছিল না কখনো।

গুণবতী।                                         প্রভু,

            এইখানে ছিল না কি দেবী?

রঘুপতি।                                     দেবী বল

            তারে? এ সংসারে কোথাও থাকিত দেবী,

            তবে সেই পিশাচীরে দেবী বলা কভু

            সহ্য কি করিত দেবী? মহত্ত্ব কি তবে

            ফেলিত নিষ্ফল রক্ত হৃদয় বিদারি

            মূঢ় পাষাণের পদে? দেবী বল তারে?

            পুণ্যরক্ত পান ক'রে সে মহারাক্ষসী

            ফেটে মরে গেছে।

अनुवादः

गुणवती। जय जय महादेवी

          देवी कहां हैं?

रघुपति। देवी नहीं है।

गुणवती। लौटा लाओ देवी को

गुरुदेव,ले आओ उन्हें,गुस्सा उनका

करुंगी मैं ठंडा।लायी हू मां की पूजा।

राज्य पति छोड़कर भागी हूं मैं

अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को.दया करो,दया करो,

देवी को लौटा लाओ,सिर्फ आज की

एक रात के लिए।कहां हैं देवी?

रघुपति। कहीं भी नहीं हैं वे

उर्द्धे नहीं हैं,निम्ने नहीं हैं,कहीं भी

नहीं है वे।कहीं वह थीं ही नहीं।

गुणवती। प्रभु,

यहीं क्या थीं नहीं वह?

रघुपति। देवी

कहती हो उसे? इस संसार में होती कहीं देवी

तो उस पिशाची को देवी कहने पर

क्या सहन कर लेती देवी? इसकी महत्ता क्या

फलती ह्रदय तोड़कर निकले निष्फल रक्त

पाषाण के पांवों पर?उसे कहती हो देवी?

पुण्य रक्त पीकर महाराक्षसी

वह पाषाण फटकर मर गयी है।

 

राजर्षि उपन्यास का आख्यान देखेंः

तीसरा परिच्छेद

राज-सभा बैठी है। भुवनेश्वरी देवी मंदिर का पुरोहित कार्यवश राज-दर्शन को आया है।

पुरोहित का नाम रघुपति है। इस देश में पुरोहित को चोंताई संबोधित किया जाता है। भुवनेश्वरी देवी की पूजा के चौदह दिन बाद देर रात को चौदह देवताओं की एक पूजा होती है। उस पूजा के समय एक दिन दो रात कोई भी घर से नहीं निकल सकता, राजा भी नहीं। अगर राजा बाहर निकलते हैं, तो उन्हें चोंताई को अर्थ-दण्ड चुकाना पडता है। किंवदंती है कि इस पूजा की रात को मंदिर में नर-बलि होती है। इस पूजा के उपलक्ष्य में सबसे पहले जो पशु-बलि होती है, उसे राजबाड़ी के दान के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसी बलि के पशु लेने के लिए चोंताई राजा के पास आया है। पूजा में और बारह दिन बचे हैं।

राजा बोले, "इस बरस से मंदिर में जीव-बलि नहीं होगी।"

सभा के सारे लोग अवाक रह गए। राजा के भाई नक्षत्रराय के सिर के बाल तक खड़े हो गए।

चोंताई रघुपति ने कहा, "क्या मैं यह सपना देख रहा हूँ!"

राजा बोले, "नहीं ठाकुर,हम लोग इतने दिन तक सपना देख रहे थे, आज हमारी चेतना लौटी है। एक बालिका का रूप धारण करके माँ मुझे दिखाई दी थीं। वे कह गई हैं, करुणामयी जननी होने के कारण माँ अपने जीवों का और रक्त नहीं देख सकतीं।"

रघुपति ने कहा, "तब माँ इतने दिन तक जीवों का रक्त-पान कैसे करती आ रही हैं?"

राजा ने कहा, "नहीं, पान नहीं किया। जब तुम लोग रक्तपात करते थे, वे मुँह घुमा लेती थीं।

पाँचवाँ परिच्छेद

प्रात:काल नक्षत्रराय ने आकर रघुपति को प्रणाम करके पूछा, "ठाकुर, क्या आदेश है?"

रघुपति ने कहा, "तुम्हारे लिए माँ का आदेश है। चलो, माँ को प्रणाम करो।"

दोनों मंदिर में गए। जयसिंह भी साथ-साथ गया। नक्षत्रराय ने भुवनेश्वरी की प्रतिमा के सम्मुख साष्टांग प्रणति निवेदन किया।

रघुपति ने नक्षत्रराय से कहा, "कुमार, तुम राजा बनोगे।"

नक्षत्रराय ने कहा, "मैं राजा बनूँगा? पुरोहित जी क्या बोल रहे हैं, उसका कोई मतलब नहीं है।"

कह कर नक्षत्रराय ठठा कर हँसने लगा।

रघुपति ने कहा, "मैं कह रहा हूँ, तुम राजा बनोगे।"

नक्षत्रराय ने कहा, "आप कह रहे हैं, मैं राजा बनूँगा?"

कह कर रघुपति के चेहरे की ओर ताकता रहा।

रघुपति ने कहा, "मैं क्या झूठ बोल रहा हूँ?"

क्षत्रराय ने कहा, "बोलिए, क्या करूँ?"

रघुपति - "ध्यानपूर्वक बात सुनो। तुम्हें माँ के दर्शन के लिए गोविन्द माणिक्य का रक्त लाना होगा।"

नक्षत्रराय ने मन्त्र के समान दोहराया, "माँ के दर्शन के लिए गोविन्द माणिक्य का रक्त लाना होगा।"

रघुपति नितांत घृणा के साथ बोल उठा, "ना, तुमसे कुछ नहीं होगा।"

नक्षत्रराय ने कहा, "क्यों नहीं होगा? जो बोला है, वही होगा। आप तो आदेश दे रहे हैं?"

रघुपति - "हाँ, मैं आदेश दे रहा हूँ।"

नक्षत्रराय - "क्या आदेश दे रहे हैं?"

रघुपति ने झुँझलाते हुए कहा, " माँ की इच्छा है, वे राज रक्त का दर्शन करेंगी। तुम गोविन्द माणिक्य का रक्त दिखा कर उनकी इच्छा पूर्ण करोगे, यही मेरा आदेश है।"

रघुपति - "सुनो वत्स, तब तुम्हें एक और शिक्षा देता हूँ। पाप-पुण्य कुछ नहीं होता। पिता कौन है, भाई कौन है, कोई ही कौन है? अगर हत्या पाप है, तो सारी हत्याएँ ही एक जैसी हैं। लेकिन कौन कहता है, हत्या पाप है? हत्याएँ तो हर रोज ही हो रही हैं। कोई सिर पर पत्थर का एक टुकड़ा गिर जाने से मर रहा है, कोई बाढ़ में बह जाने से मर रहा है, कोई महामारी के मुँह में समा कर मर रहा है, और कोई आदमी के छुरा मार देने से मर रहा है। हम लोग रोजाना कितनी चींटियों को पैरों तले कुचलते हुए चले जा रहे हैं, हम क्या उनसे इतने ही महान हैं? यह सब क्षुद्र प्राणियों के जीवन-मृत्यु का खेल खंडन योग्य तो नहीं है, महाशक्ति की माया खंडन योग्य तो नहीं है। कालरूपिणी महामाया के सम्मुख प्रतिदिन कितने लाखों-करोड़ों प्राणियों का बलिदान हो रहा है - संसार में चारों ओर से जीवों के शोणित की धाराएँ उनके महा-खप्पर में आकर जमा हो रही हैं। शायद मैंने उन धाराओं में और एक बूँद मिला दी। वे अपनी बलि कभी-न-कभी ग्रहण कर ही लेतीं, मैं बस इसमें एक कारण भर बन गया।"

तब जयसिंह प्रतिमा की ओर घूम कर कहने लगा, "माँ, क्या तुझे सब इसीलिए माँ पुकारते हैं! तू ऐसी पाषाणी है! राक्षसी, सारे संसार का रक्त चूस कर पेट भरने के लिए ही तूने यह लाल जिह्वा बाहर निकाल रखी है। स्नेह, प्रेम, ममता, सौंदर्य, धर्म, सभी मिथ्या है, सत्य है, केवल तेरी यह रक्त-पिपासा। तेरा ही पेट भरने के लिए मनुष्य मनुष्य के गले पर छुरी रखेगा, भाई भाई का खून करेगा, पिता-पुत्र में मारकाट मचेगी! निष्ठुर, अगर सचमुच ही यह तेरी इच्छा है, तो बादल रक्त की वर्षा क्यों नहीं करते, करुणा स्वरूपिणी सरिता रक्त की धारा बहाते हुए रक्त-समुद्र में जाकर क्यों नहीं मिलती? नहीं, नहीं, माँ, तू स्पष्ट रूप से बता - यह शिक्षा मिथ्या है, यह शास्त्र मिथ्या है - मेरी माँ को माँ नहीं कहते, संतान-रक्त-पिपासु राक्षसी कहते हैं, मैं इस बात को सहन नहीं कर सकता।"

उसी समय जीवंत तूफानी बारिश की बिजली के समान जयसिंह ने अचानक रात के अंधकार में से मंदिर के उजाले में प्रवेश किया। देह लंबी चादर से ढकी है, सर्वांग से बह कर बारिश की धार गिर रही है, साँस तेजी से चल रही है, चक्षु-तारकों में अग्नि-कण जल रहे हैं।

रघुपति ने उसे पकड़ कर कान के पास मुँह लाकर कहा, "लाए हो राज-रक्त?"

जयसिंह उसका हाथ छुड़ा कर ऊँचे स्वर में बोला, "लाया हूँ। राज-रक्त लाया हूँ। आप हट कर खड़े होइए, मैं देवी को निवेदन करता हूँ।"

आवाज से मंदिर काँप उठा।

काली की मूर्ति के सम्मुख खड़ा होकर कहने लगा, "तो क्या तू सचमुच संतान का रक्त चाहती है, माँ! राज-रक्त के बिना तेरी तृषा नहीं मिटेगी? मैं जन्म से ही तुझे माँ पुकारता आ रहा हूँ, मैंने तेरी ही सेवा की है, मैंने और किसी की ओर देखा ही नहीं, मेरे जीवन का और कोई उदेश्य नहीं था। मैं राजपूत हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मेरे प्रपितामह राजा थे, मेरे मातामह वंशीय आज भी राजत्व कर रहे हैं। तो, यह ले अपनी संतान का रक्त, ले, यह ले अपना राज-रक्त।" चादर देह से गिर पड़ी। कटिबंध से छुरी बाहर निकाल ली - बिजली नाच उठी - क्षण भर में ही वह छुरी अपने हृदय में आमूल भोंक ली, मृत्यु की तीक्ष्ण जिह्वा उसकी छाती में बिंध गई। मूर्ति के चरणों में गिर गया; पाषाण-प्रतिमा विचलित नहीं हुई।

(साभारःहिंदी समय,महात्मा गांधी अतरराष्ट्रीय विश्वविदयालय,वर्धा ,http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=2377&pageno=1)

  




Thursday, September 21, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-31 बांग्लादेश में रवींद्र और शरत को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने के इस्लामी राष्ट्रवाद खिलाफ आंदोलन तेज हमारे यहां शिक्षा और इतिहास के हिंदुत्वकरण के खिलाफ सन्नाटा कट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती लड़ाई। श्वेत आंतकवाद के युद्धस्थल वधस्थल बन गये भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश, हालांकि रंग श्वेत दीखता नहीं है पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-31

बांग्लादेश में रवींद्र और शरत को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने के इस्लामी राष्ट्रवाद खिलाफ आंदोलन तेज

हमारे यहां शिक्षा और इतिहास के हिंदुत्वकरण के खिलाफ सन्नाटा

कट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती लड़ाई।

श्वेत आंतकवाद के युद्धस्थल वधस्थल बन गये भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश, हालांकि रंग श्वेत दीखता नहीं है

पलाश विश्वास

कट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती कोई लड़ाई।

लालन फकीर और रवींद्रनाथ की रचनाओं को पाठ्यक्रम से निकालने के खिलाफ बांग्लादेश में आंदोलन तेज हो रहा है और रवींद्र और प्रेमचंद समेत तमाम साहित्यकारों को पाठ्यक्रम से निकालने और समूचा इतिहास को वैदिकी साहित्य में बदलने  के खिलाफ भारत में अभी कोई आंदोलन शुरु नहीं किया जा सका है।

बांग्लादेश में पाकिस्तानी शासन के दौरान 1961 में भी रवींद्र साहित्य और रवींद्रसंगीत पर हुक्मरान ने रोक लगा दी थी,जिसका तीव्र विरोध हुआ और वह रोक हटानी पड़ी।बाग्लादेश मुक्तिसंग्राम के दौरान तो रवींद्र के लिखे गीत आमार सोनार बांग्ला आमि तोमाय भोलोबासि  बांग्लादेश का राष्ट्रीय संगीत बन गया।

गौरतलब है कि 1961 के प्रतिबंध के खिलाफ ढाका में बांग्ला नववर्ष और 25 बैशाख को रवींद्र जयंती मनाने का सिलसिला शुरु हुआ जो कभी रुका नहीं है।

विविधता,बहुलता,सहिष्णुता के लोकतंत्र के खिलाफ हैं भारत के हिंदू राष्ट्रवादी और बांग्लादेश के इसलामी राष्ट्रवादी दोनों।जिस तरह संघ परिवार शिक्षा व्यवस्था के आमूल हिंदुत्वकरण के लिए लगातार विश्वविद्यालयों पर हमले कर रहा है,पाकिस्तान बनने के बाद और पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बाद वहां भी विश्विद्यालय कट्टर इस्लामी राष्ट्रवादियों  के निशाने पर हैं।

रवींद्रनाथ कहते थे कि पश्चिम के ज्ञान विज्ञान वहां के शासक वर्ग की देन नहीं है और यह आम जनता की उपज है।हमें इसे स्वीकार करना चाहिए।इसी तरह फासीवादी राष्ट्रवाद के धर्मोन्माद,नस्ली वर्चस्व और समाज और मनुष्यता के धर्म के नाम बंटवारे के राष्ट्रवाद और हिंसा,घृणा,युद्ध और विध्वंस के राष्ट्रवाद का रवींद्रनाथ विरोध करते रहे।

हम शिक्षा और ज्ञान के बदले पश्चिमी धर्मोन्मादी सैन्य राष्ट्रवाद के उत्तराधिकारी बन गये हैं तो स्वतंत्रता के बाद भी स्वदेश अभी साम्राज्यवाद का मुक्तबाजारी उपनिवेश है,जहां उच्च शिक्षा और ज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है।मध्ययुगीन बर्बर इतिहास को दोहराने का उपक्रम हमारा धर्म कर्म है।

भारत में जयभीम कामरेड के नारे के साथ जाति धर्म का दायरा तोड़कर मनुस्मति विरोधी ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन और बंगाल के होक कलरव छात्र आंदोलन से पहले युद्ध अपराधियों को फांसी पर लटकाने के खिलाफ शाहबाग छात्र युवा आंदोलन के दौरान इस महादेश के तमाम  कट्टरपंथी धर्मोन्मादी राष्ट्रवादी युद्धअपराधियों को एक ही रस्सी से फांसी पर लटकाने की मांग उठ चुकी है।

शाहबाग आंदोलन के तहत ही बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान नरसंहार के युद्ध अपराधी रजाकर और जमात नेताओं को फांसी पर लटकाने का सिलसिला जारी है। मनुष्यता के विरुद्ध युद्ध अपराधी वहां फांसी पर लटकाये जा रहे हैं,फिर भी बांग्लादेश सरकार और प्रशासन में इस्लामी राष्ट्रवादियों का वर्चस्व कायम है।

भारत में हिंदुत्व एजंडा के तहत पाठ्यक्रम के हिंदुत्वकरण अभियान के समांतर बांग्लादेश में हिफाजत और जमात के असर में पाठ्यक्रम से रवींद्रनाथ टैगोर,लालन फकीर ,शरतचंद्र,सत्यजीत रे के दादा उपेंद्र किशोर रायचौधरी और बांग्लादेश के बेहद लोकप्रिय लेखक हुमायूं आजाद की रचनाएं बाहर फेंक दी गयी है।इसके खिलाफ बांग्लादेश में छात्र,प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के मोर्चे ने ढाका विश्विद्यालय से आंदोलन शुरु कर दिया है।

हम पहले ही इस बारे में चर्चा कर चुके हैं कि बांग्लादेश में लालन फकीर और रवींद्रनाथ के खिलाफ भयंकर घृणा अभियान जारी है। बंकिम के हिंदू राष्ट्रवाद के साथ लालन और रवींद्रनाथ को जोड़कर उन्हें मुसलमानों के खिलाफ बताने का अभियान शुरु से चल रहा है।इसका व्यापक प्रतिरोध भी वहां हो रहा है।

रवींद्रनाथ के मशहूर उपन्यास गोरा के नायक को आखिरकार अहसास होता है कि उनकी कोई जाति नहीं है और वे अंत्यज है।रवींद्रनाथ ने अपनी रचनाओं में अपने को कई दफा अछूत, अंत्यज, जातिहीन, मंत्रहीन कहा है।अपनी मध्य एशिया की यात्रा के वृत्तांत उन्होंने इस्लाम और इस्लामी विरासत के बारे में उन्होंने सिलसिलेवार लिखा है।

उन्होंने लिखा हैः

'কাছের মানুষ বলে এরা যখন আমাকে অনুভব করেছে তখন ভুল করে নি এরা, সত্যই সহজেই এদের কাছে এসেছি। বিনা বাধায় এদের কাছে আসা সহজ, সেটা স্পষ্ট অনুভব করা গেল। এরা যে অন্য সমাজের, অন্য ধর্মসম্প্রদায়ের, অন্য সমাজগণ্ডীর, সেটা আমাকে মনে করিয়ে দেবার মতো কোনো উপলক্ষই আমার গোচর হয় নি।' (ঠাকুর ১৩৯২ : ২৮-২৯)

(मेरे अपना अंतरंग हाने का अहसास इन लोगों ने किया है।इन्होंने कोई गलती नहीं की है।मैं सचमुच सहज ही इनके पास चला आया।ये दूसरे समाज के लोग है,दूसरे धर्म संप्रदाय के लोग हैं या दूसरे समामाजिक अनुशासन के दायरे में हैं ये,ऐसा कुछ भी महसूस करने का कोई मौका मुझे मिला नहीं है।)

उत्तर कोरिया को तबाह करने की जो अश्लील चेतावनी श्वेत जायनी साम्राज्यवाद ने हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु धमाकों की गूंज के साथ दी है,उसमें यूरोप में धर्मयुद्ध और दैवीसत्ता का नस्ली वर्चस्व है जो यूरोप का राष्ट्रवाद पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का त्रिशुल है।इस त्रिशुल की मार अफगानिस्तान में मिसाइली हमलों,इराक के विध्वंस,लीबिया में गद्दाफी को खत्म करने के लिए बमबारी,सीरिया के गृहयुद्ध और मिश्र समेत पूरी अरब दुनिया में अमेरिकी अरब वसंत तक मनुष्यता को लहूलुहान कर रही है और इससे आतंकवाद की धर्मोन्मादी राजनीति अब मनुष्यता का अंत करने पर आमादा है।

रग और झंडा जो भी हो,यह विशुद्धता का श्वेत आतंकवाद है।धर्मयुद्ध है।

सभ्यताओं के संघर्ष के पश्चिमी उपक्रम की चर्चा रवींद्रनाथ की मध्यएशिया यात्रा के सिलसिले में पश्चिमी श्वेत आतंकवाद के इस आसमानी धर्मयुद्ध के खिलाफ रवींद्रनाथ की लंबी चेतावनी का सार प्रस्तुत किया है विनायक सेन नेः

"বোগদাদে ব্রিটিশদের আকাশফৌজ আছে। সেই ফৌজের খ্রিস্টান ধর্মযাজক আমাকে খবর দিলেন, এখানকার কোন শেখদের গ্রামে তারা প্রতিদিন বোমাবর্ষণ করছেন। সেখানে আবালবৃদ্ধবনিতা যারা মরছে তারা ব্রিটিশ সাম্রাজ্যের ঊর্ধ্বলোক থেকে মার খাচ্ছে; এই সাম্রাজ্যনীতি ব্যক্তিবিশেষের সত্তাকে অস্পষ্ট করে দেয় বলেই তাদের মারা এত সহজ। খ্রিস্ট এসব মানুষকেও পিতার সন্তান বলে স্বীকার করেছেন, কিন্তু খ্রিস্টান ধর্মযাজকের কাছে সেই পিতা এবং তার সন্তান হয়েছে অবাস্তব; তাদের সাম্রাজ্য-তত্ত্বের উড়োজাহাজ থেকে চেনা গেল না তাদের; সেজন্য সাম্রাজ্যজুড়ে আজ মার পড়ছে সেই খ্রিস্টেরই বুকে। তাছাড়া উড়োজাহাজ থেকে এসব মরুচারীকে মারা যায় এতটা সহজে, ফিরে মার খাওয়ার আশঙ্কা এতই কম যে, মারের বাস্তবতা তাতেও ক্ষীণ হয়ে আসে। যাদের অতি নিরাপদে মারা সম্ভব, মারওয়ালাদের কাছে তারা যথেষ্ট প্রতীয়মান নয়। এই কারণে, পাশ্চাত্য হননবিদ্যা যারা জানে না, তাদের মানবসত্তা আজ পশ্চিমের অস্ত্রীদের কাছে ক্রমশই অত্যন্ত ঝাপসা হয়ে আসছে।"

अनुवादः बगदाद में ब्र्टिश हुकूमत की आसमानी फौज है।उसी फौज के एक ईसाई धर्मयजक ने मुझे खबर दी कि यह फौज यहां किसी शेखों के गांव पर रोज बमबारी कर रही है।वहां बच्चे बूढ़े स्त्रियों समेत जो आम लोग मारे जा रहे हैं,वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उर्द्धलोक की मार से मारे जा रहे हैं।यह साम्राज्यवादी नीति व्यक्तिविशेष की निजी सत्ता को इस तरह अस्पष्ट रहस्यमयी भाषा में पेश करती है कि बेगुनाह मनुष्यों को मारना इतना सरल है।यीशु मसीह ने इन सभी मनुष्यों को ईश्वर की संतान माना है लेकिन ईसाई धर्मयाजक के लिए वह पिता और उनकी संतान अवास्तव बन गये हैं,उनका साम्राज्यवाद की अवधारणा युद्धक विमानों से पहचाना नहीं गया है और इसीलिए ब्रिटिश साम्राज्य में ये सारे हमले ईशा मसीह के सीने पर हो रहे हैं। इसके अलावा युद्धक विमान से मरुभूमि के वाशिंदों को मारना इतना आसान है कि जबावी मार खाने की कोई आशंका होती नहीं है और इसीलिए उनके मारे जाने का सचभी इतना क्षीण होता जाता है।जिन्हें इतनी सुरक्षित तरीके से मारना संभव है,मारनेवालों के लिए उनका कोी वजूद होता ही नहीं है।इसलिए जो लोग पश्चिम की हत्या संस्कृति से अनजान हैं,उनकी मनुष्यता का अस्तित्व भी पश्चिमी सैन्य ताकतों के लिए क्रमशः धूमिल होता जाता है।

रवींद्र की यह चेतावनी जितना पश्चिम एशिया और बाकी दुनिया का सच है,उससे बड़ा सच भारत में कृषि व्यवस्था,किसानों,दलितों,आदिवासियों और गैर हिंदुओं का सच है।यह गोरक्षा तांडव का सच है तो नरसंहार संस्कृति का सचभी है तो फिर यह आदिवासी भूगोल में अनंत बेदखली का सच भी है।

रवींद्र नाथ की यह चेतावनी आज की पृथ्वी ,आज की मनुष्यता और प्रकृति के विरुद्ध जारी उसी धर्मयुद्ध का सच है,जिस धर्मयुद्ध के श्वेत आतंकवाद की भाषा उत्तर कोरिया के लिए तबाही की चेतावनी है।

(संदर्भःরবীন্দ্রনাথ ও মধ্যপ্রাচ্য (Tagore and the Middle East)

Posted on May 9, 2014

বিনায়ক সেন)

रवींद्र समय का ब्रिटिश साम्राज्यवाद का श्वेत आतंकवाद अब अमेरिका साम्राज्यवाद है और पश्चिम एशिया में फिलीस्तीन और यरूशलम पर कब्जे का यूरोप का धर्मयुद्ध अब अमेरिका का धर्मयुद्ध भी है,जिसे हम कभी खाड़ी युद्ध तो कभी तेल युद्ध और फिर जल युद्ध या लोकतंत्र के लिए युद्ध और आखिरकार आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का युद्ध कहते रहे हैं।

नस्ली आतंकवाद के विरुद्ध इस चेतावनी के बाद और पश्चिम एशिया के यथार्थ को दूसरे विश्वयुद्ध से पहले इतना सही तरीके से पेश करने वाले रवींद्रनाथ को इस्लामी राष्ट्रवाद के झंडेवरदार मुसलमानों का दुश्मन साबित करने में लगे हैं।

दरअसल, रवींद्रनाथ और काजी नजरुल इस्लाम दोनों तुर्की के आधुनिकीकरण के कमाल पाशा करिश्मे के प्रशंसक रहे हैं।

धर्म के नाम समाज के बंटवारे के खिलाफ थे नजरुल इस्लाम और रवींद्रनाथ दोनो।इसलिए कमाल अतातुर्क की क्रांति का दोनों ने स्वागत किया है।

रवींद्रनाथ ने लिखा हैः

"কামাল পাশা বললেন মধ্যযুগের অচলায়তন থেকে তুরস্ককে মুক্তি নিতে হবে। তুরস্কের বিচার বিভাগের মন্ত্রী বললেন : মেডিয়াভেল প্রিন্সিপলস্ মাস্ট গিভ ওয়ে টু সেক্যুলার ল'স। উই আর ক্রিয়েটিং আ মডার্ন, সিভিলাইজড্ নেশন।"

अनुवादः कमाल पाशा ने कहा कि मध्ययुग की जड़ता से तुर्की को आजाद करना होगा।तुर्की के न्याय मंत्री ने कहा कि मध्यकालीन सिद्धांतों के बदले धर्मनिरपेक्ष कानून लागू करना होगा।हम एक आधुनिक ,सभ्य राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं।

रवींद्रनाथ ने शुरु से लेकर अपने जीवन के अंत तक जिस राष्ट्रवाद का विरोध किया है,वह दरअसल पश्चिम के धर्म युद्ध का वही राष्ट्रवाद है,जो समाज और मनुष्यता को धर्म के नाम पर बांटता है।

अंग्रेजों ने भारत में दो सौ सालों के अपने राज में हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया और दुश्मनी की इस मजहबी सियासत की नींव पर जो भारत ,पाकिस्तान और बांग्लादेश  का निर्माण हुआ - अखंड भारत वर्ष के वे तीनों ही टुकड़े आखिर कार श्वेत आतंकवाद के उपनिवेश बन गये,जो एक अनंत युद्धस्थल वधस्थल है और फर्क सिर्फ इतना है कि वह श्वेत आतंकवाद दीखता नहीं है और न उसका रंग श्वेत है।पश्चिम के ज्ञान विज्ञान की जगह पश्चिम की यांत्रिक आटोमेशन सभ्यता और तकनीक ने ली है।यही डिजिटल इंडिया की असल तस्वीर है।

इस्लामी कट्टरपंथ से आजादी के हक में रवींद्रनाथ का बयान इस्लामी कट्टरपंथियों को उसीतरह नागवार लगता है जैसे विविधता बहुलता,सहिष्णुता,अनेकता में एकता के मनुष्यता के धर्म से हिंदू राष्ट्रवाद को सख्त ऐतराज है।

रवींद्र नाथ के नाटक विसर्जन में मूर्तिपूजा के विरोध में देवी के अस्तित्व को झूठा साबित करने से हिंदू समाज शुरु से रवींद्र के खिलाफ रहा है।

अरब दुनिया के मशहूर शायर हाफिज के मजार पर बैठकर उन्हें अपने देश में धर्मोन्मादी सांप्रदायिकता की याद आयी और उन्होंने लिखाः

'এই সমাধির পাশে বসে আমার মনের মধ্যে একটা চমক এসে পৌঁছল, এখানকার এই বসন্তপ্রভাতে সূর্যের আলোতে দূরকালের বসন্তদিন থেকে কবির হাস্যোজ্জ্বল চোখের সংকেত। মনে হল আমরা দুজনে একই পানশালার বন্ধু, অনেকবার নানা রসের অনেক পেয়ালা ভরতি করেছি। আমিও তো কতবার দেখেছি আচারনিষ্ঠ ধার্মিকদের কুটিল ভ্রুকুটি। তাদের বচনজালে আমাকে বাঁধতে পারে নি; আমি পলাতক, ছুটি নিয়েছি অবাধপ্রবাহিত আনন্দের হাওয়ায়। নিশ্চিত মনে হল, আজ কত-শত বৎসর পরে জীবন-মৃত্যুর ব্যবধান পেরিয়ে এই কবরের পাশে এমন একজন মুসাফির এসেছে যে মানুষ হাফেজের চিরকালের জানা লোক। (ঠাকুর ১৩৯২ : ৪৩-৪৪)

बांग्लादेश के सिलाईदह,शाहजादपुर और कालीग्राम परगना में टैगोर परिवार की तीन जमींदारियां थीं।युवा रवींद्रनाथ पहलीबार 1890 में अपनी जमींदारी की देखरेख के लिए 1890 में पातिसर पहुंचे।उस वक्त तक टैगोर जमीदारियों में भयंकर सामंती व्यवस्था थी।इस बारे में कंगाल हरिनाथ के खुलना जिले के कुमारखाली से प्रकाशित अखबार ग्रामवार्ता में लगातार लिखा जाता रहा है।

लालन फकीर के सहयोगी और अनुयायी बाउल पत्रकार कंगाल हरिनाथ और उनके अखबार ग्रामवार्ता को अंग्रेजी हुकूमत और जमींदारों के खिलाफ पाबना और रंगपुर के किसान  विद्रोहों के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है।टैगोर जमींदारी के लठैतों ने उनपर हमले भी किये और उन हमलों से  पास ही स्थित लालन फकीर के अखाड़े के उनके अनुयायियों ने उन्हें बचाया।इस पर बी हमने चर्चा की है।

महर्षि देवेंद्रनाथ के सामंती चरित्र से रवींद्रनाथ के मनुष्यता का धर्म उन्हें अलग करता है।टैगोर जमींदारी के प्रजाजनों पर सामंती शिकंजा तोड़ने की पहल भी रवींद्रनाथ ने की। बाकायदा जमींदार की हैसियत से रवींद्रनाथ पहलीबार कुष्ठिया जिले के सिलाईदह में गये तो पांरपारिक पुन्याह पर्व पर उन्होंने हिंदू मुसलमान और सवर्ण दलित का भेदभाव खत्म कर दिया।

गौरतलब है कि रवींद्र नाथ के दादा प्रिंस द्वारकानाथ ठैगोर के जमाने से पुन्हयाह पर्व पर हिंदुओं और मुसलमानों के अलग अलग बैठाने का बंदोबस्त था तो हिंदुओं के लिए उनकी हैसियत और जाति के मुताबिक अलग बैठने का इंतजाम था।हिंदुओं के लिए चादर से ढकी दरिया तो मुसलमानों के लिए बाना चादर की दरिया।ब्राह्मणों को अलग से बैठाने का इंतजाम।

जमींदार के लिए रेशम से सजा सिंहासन।

रवींद्रनाथ ने यह इंतजाम देखते ही सिंहासन पर बैठे बिना नायब से इस भेदभाव की वजह पूछ ली तो उन्होंने परंपरा का हवाला दे दिया।

इसपर रवींद्रनात ने कह दिया की भेदभाव की यह परंपरा नहीं चलेगी। अलग अलग बैठने की व्यवस्था तुरंत खत्म करके हिंदू मुसलमान ब्राह्मण चंडाल सभी को एक साथ बैठाना होगा।नायब ने ऐसा करने से इंकार कर दिया तो युवा रवींद्रनाथ अड़ गये।उन्होंने खुद सिंहासन पर बैठने से इंकार कर दिया।

बाहैसियत जमींदार सबके लिए समानता का यह उनका पहला आदेश था। नायब,गोमस्ता सभी कर्मचारियों ने इस नये इंतजाम के खिलाफ एकमुश्त इस्तीफे की धमकी दे दी।इसकी परवाह किये बिना रवींद्रनाथ ने सबके लिए एक साथ बैठने का इंतजाम चालू कर दिया।नायब और कर्मचारी देखते रह गये।

यही नहीं जमींदारों के अत्याचार उत्पीड़न से मुसलमान प्रजाजनों को बचाने को रवींद्रनाथ सबसे ज्यादा प्राथमिकता देते थे।

Wednesday, September 20, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-30 गंगा और नर्मदा की मुक्तधारा को अवरुद्ध करने वाली दैवीसत्ता का फासिज्म आदिवासियों और किसानों के खिलाफ सामाजिक विषमता के खिलाफ मनुस्मृतिविरोधी लड़ाई को खत्म करना ही हिंदुत्ववादियों के हिंदू राष्ट्र का एजंडा मुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-30

गंगा और नर्मदा की मुक्तधारा को अवरुद्ध करने वाली दैवीसत्ता का फासिज्म आदिवासियों और किसानों के खिलाफ

सामाजिक विषमता के खिलाफ मनुस्मृतिविरोधी लड़ाई को खत्म करना ही हिंदुत्ववादियों के हिंदू राष्ट्र का एजंडा

मुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा।

पलाश विश्वास

टिहरी बांध का उतना प्रबल विरोध नहीं हुआ और गंगा की अबाध जलधारा हमेशा के लिए नमामि गंगा के मंत्रोच्चार के बीच अवरुद्ध कर दी गयी।पुरानी टिहरी समेत उत्तरकाशी और टिहरी की खूबसूरत घाटियां डूब में शामिल हो गयीं।अपने खेतों,अपने गांवों और आजीविका के लिए जरुरी जंगल से बेदखल मनुष्यों का पुनर्वास नहीं हुआ अभीतक।कांग्रेसी राजकाज के जमाने में सोवियत सहयोग से बने इस बांध के विरोध में व्यापक जन आंदोलन नहीं हो सका क्योंकि तब पहाड़ में शक्तिशाली वाम दलों और संगठनों ने सोवियत पूजी का विरोध नहीं किया।उत्तराखंड अलग राज्य के लिए आंदोलन करने वाले लोगों ने भी टिहरी बांध का विरोध नहीं किया।पर्यावरण कार्यकर्ताओं,चिपको और सर्वोदय आंदोलन के मंच से हालांकि इस बांध परियोजना का जोरदार विरोध किया जाता रहा है।

इससे पहले दामोदर वैली,हिराकुड,रिंहद और भाखड़ा समेत तमाम बड़े बांधों का विकास,बिजली और सिंचाई के लिए अनिवार्य मान लिया गया।इन बांधों के कारण जल जंगल जमीन से बेदखल आदिवासियों और किसानों का आजतक पुनर्वास नहीं हो सका है।विकास परियोजनाओं में विस्थापितों का पुनर्वास कभी नहीं हुआ है और इस विकास के बलि होते रहे हैं आदिवासी और किसान।

मुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा।

इस तुलना में नर्मदा बांध का विरोध सिलसिलेवार होता रहा है और कुड़नकुलम परमाणु संयंत्र का भी विरोध जोरदार रहा है।कुड़नकुलम परमाणु संयंत्र में जनप्रतिरोध के दमन के साथ परमाणु बिजली का उत्पादन शुरु हो चुका है तो नर्मदा बांध दैवी सत्ता के आवाहन के साथ राष्ट्र को समर्पित है।

रवींद्र नाथ मुक्त जलधारा को बांधने के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के साथ थे।अपना नाटक मुक्तधारा उन्होंने 1922 में लिखी।1919 में जालियांवाला नरसंहार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम तेज होने के दौरान।

1919 और 1922 के बीच मतभेदों के बावजूद गांधी और रवींद्रनाथ की नजदीकी बढ़ी और मुक्तधारा लिखने से पहले 1921 में अपनी यूरोप यात्रा से लौटकर कोलकाता में रवींद्रनाथ ने बंद कमरे में चारघटे तक बातचीत की थी।

1905 में बंगभंग आंदोलन के बाद रवींद्रनाथ 1919 के जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय थे।

गांधी और रवींद्र दोनों पश्चिमी देशों के जिस औपनिवेशिक साम्राज्यवादी नस्ली राष्ट्रवाद का विरोध कर रहे थे,उसके खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध संवत्ंतरता संग्राम के पक्ष में यह नाटक है।गांधी जिसे पागल दौड़ कहते हैं,यंत्र और तकनीक निर्भर मनुष्यता विरोधी प्रकृतिविरोधी उस विकास के विरुद् है यह नाटक।

यांत्रिक मुक्ताबाजारी सभ्यता में आजीविका और रोजगार छीनने के कारपोरेट राज में डिजिटल इंडिया के आटोमेशन निर्भर राजकाज के संदर्भ में भी यह नाटक बहुत प्रासंगिक है।1921 की उस मुलाकात के बाद गांधी जहां असहयोग आंदोलन तेज करने में लगे रहे वहीं रवींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन में विश्वविद्यालय बनाने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया।दोनों आंदोलन के दौरान एक मंच पर नहीं थे।

1919 से लेकर 1922 की अवधि में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चल रहा था तो वह खिलाफत आंदोलन का दौर भी था और उसी दौरान औद्योगिक इकाइयों में मजदूर आंदोलन के जरिये ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता का प्रतिरोध तेज से तेज होता रहा।

इसी प्रतिरोध की अभिव्यक्ति रवींद्रनाथ के मुक्तधारा नाटक में हुई।उत्तरकूट होकर शिवतराई के मध्य प्रवाहित नदी मुक्तधारा को उत्तरकूट के राजा रणजीत रोक देते हैं किसानों के दमन के लिए।युवराज अभिजीत किसानों के साथ हो गये थे और राजकीय जिम्मेदारी के खिलाफ उन्होंने किसानों का लगान माफ कर दिया।मुक्तधारा पर बांध का निर्माण का एक कारण युवराज विद्रोह भी था।बांध बनने के पीछे किसान युवराज का हाथ देखने लगे तो अपनी जान देकर उन्होंने उस बांध को तोड़ दिया।

रवींद्रनाथ सम्यवादी नहीं थे।जाहिर है कि उनकी इस रचना में वर्गचेतना उसी तरह नहीं है जैसे उनके दूसरे बेहद प्रासंगिक नाटक रक्तकरबी में वर्ग चेतना जैसी कोई चीज नहीं है।मुक्तधारा में जहां युवराज बांध तोड़ देते हैं,वहीं रक्तकरबी में राजा खुद किसानों और मेहनतकशों के मुक्ति संग्राम में शामिल हो जाते हैं।

जाहिर है कि रवींद्रनाथ के लिए मनुष्यता और मनुष्यता के धर्म  विशुद्ध सामयवादी वस्तुवादी दर्शन के ज्यादा महत्वपूर्ण है और एक दूसरे के वर्गशत्रु  को बदलाव के लिए एक साथ खड़ा कर देते हैं।

रवींद्र रचनासमग्र में यह भाववादी दृष्टिकोण बहुत प्रबल है और इसकी जड़ें भी सूफी संत बाउल फकीर आंदोलन के भारतीय दर्शन में है।

स्वदेश चिंता में रवींद्रनाथ ने साफ साफ लिखा है कि बौद्ध धर्म के अवसान के बाद से लगातार भारत में दैवी सत्ता की स्थापना के लिए मनुस्मृति विधान सख्ती से लागू किया जाने लगा और बहुसंख्य आम जनता शूद्र और अछूत हो गये।गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति और उस वजह से हुए सामाजिक परिवर्तन की आशंका से हिंदू समाज आतंकित हो गया तो मनुस्मृति व्यवस्था कायम रखने की कोशिशें समाज को पीछे की ओर धकेलने लगा।

इस द्वंद के बावजूद भारत में मनुष्याता के धर्म में विविधता में एकता की बात वे लगातार कर रहे हैं।

गौरतलब है कि आस्था और धर्म कर्म संस्कार रीति रिवाज के मामले में आम लोग परंपराओं का ही पालन करते हैं और अपनी अपनी लोकसंस्कृति के मुताबिक ही उनका समाजिक और धार्मिक आचरण होता है और इसे लेकर हिंदुओं और गैरहिंदुओं में कोई विवाद नहीं है।

सारा विवाद मनुस्मृति की बहाली करके दैवी सत्ता और राजसत्ता के एकीकरण के नस्ली वर्चस्व को लेकर है जो अब अंध राष्ट्रवाद है और इसी अंध राष्ट्रवाद का विरोध रवींद्रनाथ लगातार करते रहे हैं,जो आजाद बारत में सीधे तौर पर कारपोरेट एजंडा है।इसलिए मुक्तधारा की प्रासंगिकता बहुत बढ़ गयी है।

कुल मिलाकर यह विरोध हिंदुओं और गैरहिंदुओं के बीच नहीं है।यह हिंदू समाज का आतंरिक गृहयुद्ध है और इस सिलसिले में गौरतलब है धर्मोन्माद के विरोध की वजह से मारे गये दाभोलकार,पानसारे,कुलबर्गी,रोहित वेमुला और गौरी लंकेश सबके सब हिंदू थे तो मनुस्मृति का विरोध करते थे।

रवींद्रनाथ इसी सामाजिक विषमता को सूफी संत परंपरा की साझा विरासत के तहत खत्म करना चाहते थे और इसी सिलसिले में वे लगातार जल जंगल जमीन और किसानों,आदिवासियों,शूद्रों,अछूतों,स्त्रियों और मेहनतकशों के लिए समानता और न्याय की आवाज को अपनी रचनाधर्मिता बनाये हुए थे।

जड़ समाज को गति देने के लिए उन्होंने शूद्रों और मेहनतकशों की पहल पर आधारित नाटक रथेर रशि भी लिखी है,जिसकी हम चर्चा करेंगे।

हम सांतवीं आठवीं सदी के मंदिर केंद्रित शैव और वैष्णव भक्ति आंदोलनों के मनुस्मृति विरोधी आंदोलन में बदलने की सिलसिलेवार चर्चा की है।

इसी सिलसिले में वध संस्कृति के शिकार द्रविड़ लिंगायत गौरी लंकेश की पृष्ठभूमि में लिंगायत आंदोलन की चर्चा जरुरी है।

उत्तर भारत के सूफी संत बाउल फकीर वैष्णव आंदोलन से पहले भक्ति आंदोलन के सिलसिले में बारहवीं सदी में बासवेश्वर या बसेश्वर के लिंगायत धर्म आंदोलन की स्थापना हुई।बसेश्वर के इस आंदोलन का मुख्य स्वर ब्राहमणवाद का विरोध और चरित्र जाति तोड़ो आंदोलन है।

मनुस्मृति के कट्टर अनुशासन के निषेध के साथ मनुस्मृति और जातिव्यवस्था को सिरे से लिंगायत आंदोलन ने नामंजूर कर दिया और लिंगायत ध्र्म के अनुयायी अपने को हिंदू भी नहीं मानते रहे हैं।वे वैदिकी सभ्यता,कर्मकांड,रस्मोरिवाज का विरोध करते थे,जिसका कर्नाटक में व्यापक प्रभाव हुआ।

बंगाल में मतुआ आंदोलन भी ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध था।ब्रह्मसमाज आंदोलन भी।जिसाक पूरीतरह हिंदुत्वकरण हो गया है।

इसके विपरीत बारहवीं सदी से कर्नाटक में लिंगायत धर्म का प्रभाव अटूट है।लिंगायत अनुयायी जीवन के हर क्षेत्र में कर्नाटक में नेतृ्त्व करते हैं और हिंदुत्ववादियों को इसी लिंगायत धर्म से ऐतराज है और इसीलिए इसकी प्रवक्ता गौरी लंकेश की हत्या हो गयी।

सामाजिक विषमता के खिलाफ मनुसमृतिविरोधी लड़ाई को खत्म करना ही हिंदुत्ववादियों के हिंदू राष्ट्र का एजंडा है।

रवींद्रनाथ इस विषमता को खत्म करने के लिए ही विविधता,बहुलता,सहिष्णुता और अनेकता में एकता आधारित मनुष्यता के धर्म की बात कर रहे थे।पारिवारिक पृष्ठभूमि ब्रहमसमाजी होने के बावजूद वे अपने को ब्रह्मसमाजी नहीं मानते थे।

आप इसे रवींद्रनाथ का भाववादी होना बता सकते हैं लेकिन उनकी वैज्ञानिक दृष्टि को नजरअंदाज नहीं कर सकते और न ही मुक्तबाजारी मनुस्मृति कारपोरेट एजंडा के प्रतिरोध में उनकी प्रासंगिकता को खारिज कर सकते हैं।

रवींद्रनाथ शुरु से सत्ता वर्ण वर्चस्व के खिलाफ हैं।

स्वदेशी समाज पर उन्होंने लिखा हैः


নিশ্চয় জানিবেন, ভারতবর্ষের মধ্যে একটি বাঁধিয়া তুলিবার ধর্ম চিরদিন বিরাজ করিয়াছে। নানা প্রতিকূল ব্যাপারের মধ্যে পড়িয়াও ভারতবর্ষ বরাবর একটা ব্যবস্থা করিয়া তুলিয়াছে, তাই আজও রক্ষা পাইয়াছে। এই ভারতবর্ষের উপরে আমি বিশ্বাসস্থাপন করি। এই ভারতবর্ষ এখনই এই মুহূর্তেই ধীরে ধীরে নূতন কালের সহিত আপনার পুরাতনের আশ্চর্য একটি সামঞ্জস্য গড়িয়া তুলিতেছে। আমরা প্রত্যেকে যেন সজ্ঞানভাবে ইহাতে যোগ দিতে পারি—জড়ত্বের বশে বা বিদ্রোহের তাড়নায় প্রতিক্ষণে ইহার প্রতিকূলতা না করি।

বাহিরের সহিত হিন্দুসমাজের সংঘাত এই নূতন নহে। ভারতবর্ষে প্রবেশ করিয়াই আর্যগণের সহিত এখানকার আদিম অধিবাসীদের তুমুল বিরোধ বাধিয়াছিল। এই বিরোধে আর্যগণ জয়ী হইলেন, কিন্তু অনার্যেরা আদিম অস্ট্রেলিয়ান বা আমেরিকগণের মতো উৎসাদিত হইল না; তাহারা আর্য উপনিবেশ হইতে বহিষ্কৃত হইল না; তাহারা আপনাদের আচারবিচারের সমস্ত পার্থক্যসত্ত্বেও একটি সমাজতন্ত্রের মধ্যে স্থান পাইল। তাহাদিগকে লইয়া আর্যসমাজ বিচিত্র হইল।

এই সমাজ আর-একবার সুদীর্ঘকাল বিশ্লিষ্ট হইয়া গিয়াছিল। বৌদ্ধ-প্রভাবের সময় বৌদ্ধধর্মের আকর্ষণে ভারতবর্ষীয়ের সহিত বহুতর পরদেশীয়ের ঘনিষ্ঠ সংস্রব ঘটিয়াছিল; বিরোধের সংস্রবের চেয়ে এই মিলনের সংস্রব আরো গুরুতর। বিরোধে আত্মরক্ষার চেষ্টা বরাবর জাগ্রত থাকে—মিলনের অসতর্ক অবস্থায় অতি সহজেই সমস্ত একাকার হইয়া যায়। বৌদ্ধ-ভারতবর্ষে তাহাই ঘটিয়াছিল। সেই এশিয়াব্যাপী ধর্মপ্লাবনের সময় নানা জাতির আচারব্যবহার ক্রিয়াকর্ম ভাসিয়া আসিয়াছিল, কেহ ঠেকায় নাই।

কিন্তু এই অতিবৃহৎ উচ্ছৃঙ্খলতার মধ্যেও ব্যবস্থাস্থাপনের প্রতিভা ভারতবর্ষকে ত্যাগ করিল না। যাহা-কিছু ঘরের এবং যাহা-কিছু অভ্যাগত, সমস্তকে একত্র করিয়া লইয়া পুনর্বার ভারতবর্ষ আপনার সমাজ সুবিহিত করিয়া গড়িয়া তুলিল; পূর্বাপেক্ষা আরো বিচিত্র হইয়া উঠিল। কিন্তু এই বিপুল বৈচিত্র্যের মধ্যে আপনার একটি ঐক্য সর্বত্রই সে গ্রথিত করিয়া দিয়াছে। আজ অনেকেই জিজ্ঞাসা করেন, নানা স্বতোবিরোধআত্মখণ্ডনসংকুল এই হিন্দুধর্মের এই হিন্দুসমাজের ঐক্যটা কোন্‌খানে? সুস্পষ্ট উত্তর দেওয়া কঠিন। সুবৃহৎ পরিধির কেন্দ্র খুঁজিয়া পাওয়াও তেমনি কঠিন—কিন্তু কেন্দ্র তাহার আছেই। ছোটো গোলকের গোলত্ব বুঝিতে কষ্ট হয় না, কিন্তু গোল পৃথিবীকে যাহারা খণ্ড খণ্ড করিয়া দেখে তাহারা ইহাকে চ্যাপটা বলিয়াই অনুভব করে। তেমনি হিন্দুসমাজ নানা পরস্পর-অসংগত বৈচিত্র্যকে এক করিয়া লওয়াতে তাহার ঐক্যসূত্র নিগূঢ় হইয়া পড়িয়াছে। এই ঐক্য অঙ্গুলির দ্বারা নির্দেশ করিয়া দেওয়া কঠিন, কিন্তু ইহা সমস্ত আপাত-প্রতীয়মান বিরোধের মধ্যেও দৃঢ়ভাবে যে আছে, তাহা আমরা স্পষ্টই উপলব্ধি করিতে পারি।

ইহার পরে এই ভারতবর্ষেই মুসলমানের সংঘাত আসিয়া উপস্থিত হইল। এই সংঘাত সমাজকে যে কিছুমাত্র আক্রমণ করে নাই, তাহা বলিতে পারি না। তখন হিন্দুসমাজে এই পরসংঘাতের সহিত সামঞ্জস্যসাধনের প্রক্রিয়া সর্বত্রই আরম্ভ হইয়াছিল। হিন্দু ও মুসলমান সমাজের মাঝখানে এমন একটি সংযোগস্থল সৃষ্ট হইতেছিল যেখানে উভয় সমাজের সীমারেখা মিলিয়া আসিতেছিল; নানকপনথীসম কবীরপনথীএম ও নিম্নশ্রেণীর বৈষ্ণবসমাজ ইহার দৃষ্টান্তস্থল। আমাদের দেশে সাধারণের মধ্যে নানা স্থানে ধর্ম ও আচার লইয়া যে-সকল ভাঙাগড়া চলিতেছে শিক্ষিত-সম্প্রদায় তাহার কোনো খবর রাখেন না। যদি রাখিতেন তো দেখিতেন, এখনো ভিতরে ভিতরে এই সামঞ্জস্যসাধনের সজীব প্রক্রিয়া বন্ধ হয় নাই।

সম্প্রতি আর-এক প্রবল বিদেশী আর-এক ধর্ম আচারব্যবহার ও শিক্ষাদীক্ষা লইয়া আসিয়া উপস্থিত হইয়াছে। এইরূপে পৃথিবীতে যে চারি প্রধান ধর্মকে আশ্রয় করিয়া চার বৃহৎ সমাজ আছে—হিন্দু, বৌদ্ধ, মুসলমান, খ্রীস্টান—তাহারা সকলেই ভারতবর্ষে আসিয়া মিলিয়াছে।